संस्कार केंद्र गीत, कहानी व खेल

विद्या भारती द्वारा समाज के उस क्षेत्र में शिक्षा और संस्कार की ज्योति जलाने के लिए छोटे-छोटे केन्द्रों की आवश्यकता हो गई है जिनके माध्यम से शिक्षा को उपेक्षित एवं मलिन बस्तियों तक पहुंचाकर देश प्रेम स्वावलंबन साक्षरता के संस्कार इन उपेक्षित बस्तियों के बच्चों में भरे जा रहे हैं। इन छोटे-छोटे अनौपचारिक शिक्षा केन्द्रों को संस्कार केन्द्र का नाम दिया गया है। इनकी गतिविधियों में रोचकता तथा संस्कार क्षमता लाने की दृष्टि से इस पुस्तक में इन्हीं संस्कार केन्द्रों के लिए छोटे-2 गीत, कहानी और खेलों का विस्तृत विवरण दिया गया है जो बच्चों को संस्कारित करने में बहुत उपयोगी है।

20.00
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संस्कृत शिक्षा पाठ्यक्रम

बालकों के सर्वांगीण विकास के लिए पांच आधारभूत विषय निर्धारित किये हैं। संस्कृत उनमें से एक अनिवार्य विषय है, जिसको सभी कक्षाओं में पढ़ाया जाता है। संस्कृत के बिना कोई भी बालक भारत की आत्मा को नहीं समझ सकता। वास्तव में तो सारी संस्कृति ही संस्कृत के आधार पर खड़ी है और बालक को अपने प्राचीन गौरव से अवगत कराने हेतु संस्कृत का ज्ञान महत्वपूर्ण है। संस्कृत को लोकप्रिय बनाने और उसके आधार पर बच्चों को उदात्त आदर्शों से संस्कारित करने की दृष्टि से कक्षा प्रथम से अष्टमी तक के लिए यह पाठ्यक्रम निर्माण किया गया है।

30.00
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स्वामी विवेकानन्द के शिक्षा-विषयक विचार

स्वामी विवेकानन्द मानव निर्माण का सबसे बड़ा साधन शिक्षा को मानते थे। उन्होंने मानव निर्माण करने वाली शिक्षा की कल्पना विश्व को दी जिसके आधार पर भौतिकता के अंधकार में भटकती हुई मानवता को पतन अवस्था से बचाया जा सकता है। उनके शिक्षा सम्बन्धी विचार राष्ट्र के विकास के लिए प्रकाश का पुंज हैं। वर्तमान शिक्षा प्रणाली केवल सूचनाओं का बोझ बनकर रह गयी है। पाश्चात्य प्रभाव से यह भौतिकवाद एवं भोगवाद का साधन बन गयी है। विवेकानन्द ने शिक्षा की इस दैन्य अवस्था को पहचाना और शिक्षा विषयक श्रेष्ठ विचार देकर राष्ट्र को दृढ़ आधार प्रदान किया, जिनका विश्लेषण इस पुस्तक में किया गया है।

90.00
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हम निर्माणकर्ता हैं या सृजनकर्ता

विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान भारत का शिक्षा जगत का सबसे बड़ा संगठन है जिसका उद्देश्य एक अभिनव शिक्षा पद्धति को प्रस्थापित करना है जो इस भूमि की परंपराओं से जुड़ी हो इस दृष्टि से सभी कार्यकर्ताओं को यह बोध कराने हेतु कि हम निर्माण करता है या सृजन करता यह लघु पुस्तिका अत्यंत ज्ञानवर्धक है विशेषकर यह महत्वपूर्ण जानकारी भी दी गई है कि हिंदुत्व का विचार संसार के अन्य मजहब से जिन्हें भ्रम वश धर्म कह दिया जाता है किस दृष्टि से भिन्न तथा श्रेष्ठ है इसमें धर्म को ठीक ढंग से परिभाषित भी किया गया है इस विषय पर भारत के उच्च विचारक माननीय श्री रंगा हरि जी के चार उद्बोधन का संकलन इस पुस्तिका में किया गया इसमें हमारी वंदना तथा अभ्युदय और श्रेयस जो धर्म के दूसरे हैं उनका भी बहुत विशद तथा स्पष्ट वर्णन किया गया है जिससे प्रत्येक कार्यकर्ता लाभान्वित हो सकता है और समाज का उचित मार्गदर्शन कर सकता है।

30.00
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हम सरस्वती पुत्र

विद्यालय में छात्रों के सर्वाधिक निकट रहने वाले, उन्हें शिक्षा देने वाले, छात्रों के व्यक्तित्व को अपने स्पर्श से समुचित दिशा देने वाले, शिक्षक हैं। कैसी होनी चाहिए उनकी मानसिक तैयारी ? दुर्योग से, कैरियर के रूप में शिक्षक बनना आज के युवा वर्ग की प्राथमिकता सूची में शायद सबसे नीचे है। अन्य जॉब्स खोज कर असफल हुए, थके हुए तन और हारे हुए मन से शिक्षक की नौकरी ‘ स्वीकार करने वाले शिक्षकों से किसका भला होने वाला है शिक्षा का, छात्र का, विद्यालय का या स्वयं शिक्षक का? गुरु का ‘ गौरव ‘ तो ‘ गुरुत्व ‘ के गुणों से प्राप्त होगा न ? उसकी कितनी तैयारी है आज शिक्षकों में ? लेखक ने विषयबद्ध और व्यावहारिक ढंग से इन्हें प्रस्तुत किया है। जिससे पुस्तक का विषय रोचक तथा प्रेरणादायी बनकर उभरा है।

60.00
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हमारा लक्ष्य (पुस्तक)

वर्तमान शिक्षा न तो भारतीय समाज की प्रकृति के अनुकूल है और न ही यह सच्ची शिक्षा है। ये तो अंग्रेजों द्वारा चलायी गयी अपने राज व्यवस्था को दृढ़ करने वाली योजना है। दुर्भाग्य से देश में एक भी शिक्षाविद् स्वाधीनता के बाद ऐसा नहीं पैदा हुआ जो इसमें परिवर्तन ला सके। यह देखकर कि शिक्षा दिशाहीन और उद्देश्य विहीन है विद्या भारती ने इस चुनौती को स्वीकार किया और शिक्षा में एक नया राष्ट्रीय विकल्प शुरू करने के लिए एक संकल्प लिया। जिसको सफल बनाने के लिये राष्ट्रीय विचारकों ने विद्या भारती नाम का विश्व का सबसे बड़ा शैक्षाणिक संगठन खड़ा कर दिया है। इसने एक महान लक्ष्य अपने सामने रखा है कि भारत को फिर से विश्व गुरु बनायेंगे और भटकती हुई युवा पीढ़ी को सुसंस्कारित बनाकर देश में सारे अभाव ग्रस्त बंधुओं को सारी दृरावस्था से मुक्त करायेंगे। इस पुस्तक में विद्या भारती लक्ष्य की भावोत्तेजक और प्रेरणा पद व्याख्या प्रस्तुत की गई है।

15.00
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