विद्यालय सामाजिक चेतना के केन्द्र बनें

शिक्षा के द्वारा ही व्यक्ति के जीवन और समाज का निर्माण होता है। समाज में जैसी परम्पराएं हम स्थापित और विकसित करना चाहते हैं, उनके लिए सशक्त माध्यम हमारे विद्यालय ही हैं। प्रजातंत्र में तो विशेष रूप से शिक्षा ही परिवर्तन का एकमात्र माध्यम है। बालक अच्छे नागरिक बनकर समाज के दायित्वों को निभाना सीखें तभी स्वस्थ समाज बनेगा। अतः हमारे शिक्षा संस्थानों और गतिविधियों को सामाजिक चेतना के केन्द्र के रूप में संचालित करने के लिए इस पुस्तक का निर्माण किया गया है और इस क्षेत्र में कार्य करने के लिए यह उपयोगी सिद्ध होगी।

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विद्यालयीन शिक्षा में क्रियाशोध

क्रियाशोध विद्यालय की सामाजिक समस्याओं का समाधान करने की प्रभावशाली विधि है जिससे शिक्षक बहुत लाभान्वित हो सकते हैं। दिसम्बर 1989 में ओडिशा भुवनेश्वर में शिक्षा विकास समिति ने एक शोध गोष्ठी में ऐसी अनेक समस्याओं तथा उनका क्या समाधान निकाला, इस विषय पर बहुत महत्वपूर्ण जानकारी देने वाली गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें विभिन्न विद्यालयों ने अपने-अपने अनुभव प्रस्तुत किए। इनका लाभ पाठ्यक्रम सुधार पर बहुत हुआ। विभिन्न विद्यालयों में जो भी समय-समय पर आने वाली समस्याओं का समाधान निकाला गया, वह सारा इस पुस्तक में संकलित है, जो आचार्यों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है।

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शारीरिक शिक्षा पाठ्यक्रम

प्राचीन भारत की शिक्षा पद्धति में बालक के सर्वांगीण विकास पर पूरा बल दिया जाता था जिसमें निरोग काया और स्वस्थ शरीर को सभी धर्मो में पालन का आधारभूत माध्यम माना जाता था। विद्या भारती ने भी बच्चों में सर्वांगीण विकास हेतु शारीरिक शिक्षा को बहुत महत्व प्रदान किया है और इसे पाँच अनिवार्य विषयों में से एक माना है। हमारे मनीषी कहते हैं प्रथम सुख निरोगी काया है। इस शारीरिक शिक्षा को विधिवत रूप से चलाने के लिये पूर्व प्राथमिक से लेकर कक्षा दशम तक के लिये यह सुनियोजित पाठ्यक्रम तैयार किया गया है जो सभी विद्यालयों में अनिवार्य रूप से चलाया जा रहा है।

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शिक्षण मंथन

शिक्षणमंथन

शिकायचे कशासाठी? शिकायचे काय? शिकवणार कोण? शिक्षण म्हणजे काय?अशा मुलभूत प्रश्नांमधून आपण अजून बाहेर पडलेलो नाही.
आपल्या शिक्षणाचा गुरुत्वमध्य
देशाबाहेर युरोपकेंद्रित करता आलेला नाही. शिक्षण हे व्यक्ती, समाज, दृष्टी या सर्वांचा विकास करणारे, सर्वांच्या गरजा भागवणारे व्हायला हवे तसे ते नाही.

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शिक्षा में बोध चतुष्ट्य

शिक्षा के स्वरूप की व्याख्या कुछ आधारभूत सिद्धान्तों पर आधारित है जिन पर अखिल भारतीय कार्यशालाओं की समीक्षा बैठक फरवरी 2017 में बड़े विशद् रूप से की गई थी। उन चार बिन्दुओं पर पुस्तक में गहनता से प्रकाश डाला गया है तथा शिक्षा की आगामी दिशा भी निर्धारित की गयी है, जिन बिन्दुओं पर भारतीय शिक्षा का भवन निर्मित करना है। शिक्षा में गुणवत्ता भी बढ़े और समाज पर उसका प्रभाव भी स्पष्ट दिखाई दे इसके लिए पुस्तक में जो उच्च शिक्षाविदों के विचारों को संकलित रूप में वर्णित किया गया वह प्रत्येक शिक्षाविद् तथा शिक्षा की व्यवस्था करने वालों के लिए अत्यावश्यक सिद्ध हो सकते हैं, जो सांस्कृतिक धारा को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे संक्रमित करना चाहते हैं उनके लिए यह पुस्तक बहुत उपयोगी तथा मार्गदर्शक है।

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शिशु शिक्षा: वर्तमान संदर्भ में

आज का शिशु कल का श्रेष्ठ नागरिक बनने वाला है। उसको जिस दिशा में मोड़ दिया जाएगा जीवन भर उसी दिशा में उसका जीवन संचालित होगा। प्राचीन भारत में ऐसा प्रावधान रहा कि बालक पांच वर्ष तक माता की गोद में, दादी के दुलार में, परिवार के सारे संस्कार ग्रहण करे, फिर उसके पश्चात विद्यालीय शिक्षा के लिए भेजा जाए। परन्तु आज बालक को यह पारिवारिक तथा सामाजिक संस्कार नहीं मिल पा रहे हैं क्योंकि उसे बहुत छोटी अवस्था में ही पाठशालाओं में भेजने की नगरीय व्यवस्था में फंसा दिया जाता है। पुस्तक इस दिशा में महत्वपूर्ण मार्गदर्शिका का कार्य करती है कि बालक को चरित्रवान बनाने हेतु शिशु को किस प्रकार से विकसित करना है कि उसका व्यक्तित्व निखरे और वह संस्कारवान नागरिक बन सके।

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शैक्षिक चिंतन

माननीय श्री लज्जा राम तोमर का नाम उन शिक्षा मनीषियों में लिया जाता है जिन्होंने शिक्षा को शुद्ध भारतीय दृष्टि से देखा है और शिक्षा के प्रत्यक्ष पक्ष पर इसी भारतीय दृष्टि से विचार किया| शिक्षा के पुरोधा होने के नाते उनके विचार सारे शिक्षा क्षेत्र का मार्गदर्शन करने वाले हैं| उन्होंने नई पीढ़ी को भारत की परंपराओं के अनुरूप ढालने के लिए संस्कृति बोध परियोजना जैसे कई प्रकल्प दिए हैं| उन्होंने बहुत कुछ लिखा है और बहुत विषयों पर अपने मूल्यवान विचार व्यक्त किए हैं| जो शिक्षा जगत के लिए अमूल्य सिद्ध हो सकते हैं ऐसे सभी विचारों का संकलन इस मूल्यवान पुस्तक में किया गया| शिक्षा के सभी पक्षों शिशु शिक्षा, बाल शिक्षा आदि छात्रावास व्यवस्था, आचार्य प्रशिक्षण, पांच आधारभूत विषयों की शिक्षा आदि उनके गंभीर विचार इस ग्रंथ में समाहित हैं| शिक्षा को सच्चा राष्ट्रीय आधार प्रदान करने हेतु यह पुस्तक प्रत्येक शिक्षाविद के लिए मार्गदर्शिका सिद्ध होगी|

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संगीत शिक्षण पाठ्यक्रम

विद्या भारती द्वारा निर्धारित पाँच आधारभूत विषयों में से संगीत शिक्षा एक महत्वपूर्ण विषय है। संगीत मानव जीवन में उल्लास तो लाता ही है यह आत्मिक साधना का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है। विद्यालय में सारे वातावरण को संगीतमय बनाने, जीवन की नीरसता को समाप्त करने और मन को ईश्वर की साधना में लगाने के लिए सभी ने संगीत को महत्वपूर्ण माना है। विद्या भारती ने इसी दृष्टि से पूर्व प्राथमिक से लेकर कक्षा बारह तक के लिये इस पाठ्यक्रम का निर्धारण किया है।

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संस्कार केंद्र आयाम कृति व स्वरूप

भारत के ऋषियों ने सेवा को ही बहुत बड़ा पूजन माना है। देश के ऐसे पिछड़े और अनुसूचित वर्ग में अनौपचारिक शिक्षा को पहुँचाने के लिये संस्कार केन्द्रों की स्थापना की गई है। इस पुस्तक में सेवा दर्शन, उपेक्षित और मलिन बस्तियों में संस्कार स्वावलम्बन, स्थास्थ्य बोध और स्वदेश प्रेम जगाने के लिये दिशा बोध और इन संस्कार केन्द्रों में चलाये जाने वाले कार्यक्रमों की रूप रेखा विस्तार से वर्णित की गई है। इस चुनौतीपूर्ण कार्य को करने के लिए यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी।

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