भारतीय शिक्षा के मूल तत्व

भारत सभ्यता के आरंभ से ही ज्ञान की साधना और सारे विश्व में ज्ञान का प्रकाश फैलाने में रत रहा है। प्राचीन काल में भारत ने अपनी विशिष्ट शिक्षा पद्धति विकसित कर ली थी, जिसके कारण हमारे देश ने सारे विश्व का सांस्कृतिक नेतृत्व किया। अंग्रेजों के शासनकाल में इस शिक्षा पद्धति की उपेक्षा हुई परन्तु आज स्वतंत्र भारत फिर से अपने मूल की ओर लौटने के लिए प्रयासरत है। शिक्षा को प्राचीन परम्पराओं के आधार पर स्थापित करने के लिए उन सभी मूल तत्वों को खोजकर इस पुस्तक में समाहित किया गया है। स्वाधीन भारत में स्वाभिमान को जगाने वाले शिक्षा केन्द्रों की स्थापना की जा सकती है।

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भारतीय शिक्षा मनोविज्ञान के आधार

शिक्षा का मनोविज्ञान के साथ बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध है जब तक शिक्षक यह नहीं जानता कि किसको पढ़ाना है और उसकी समझने की क्षमता कितनी है तथा उसको कैसे पढ़ाना है तब तक सारी शिक्षा प्रक्रिया निष्फल और व्यर्थ रहती है। शिक्षा का काम सूचना देना मात्र नहीं अपितु व्यक्तित्व में पूर्ण रूप से परिवर्तन लाना है। दुर्भाग्य से आज जो पाश्चात्य मनोविज्ञान जो हमारे शिक्षाविधो को पढ़ाया जा रहा है, वह मानव व्यक्तित्व की पूर्ण व्याख्या नहीं कर पाता। इस पुस्तक में भारतीय शिक्षा मनोविज्ञान के उन आधारों की बहुत विस्तृत रूप से वर्णित किया गया है जो व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के आवश्यक तत्व हैं।

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भारतीय साहित्य में राष्ट्रीय सांस्कृतिक भावना

यह शोध आधारित कृति हिंदी के भारतेन्दु हरिशचंद्र तथा तेलुगु के कंदुकूरि वीरेशलिंगम के गद्य साहित्य रचनाओं के तुलनात्मक अध्ययन पर आधारित है जिस पर उन्हें आंध्र विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की उपाधि भी प्राप्त हुई है । लेखक ने तत्कालीन राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक तथा साहित्यिक परिस्थितियों से सहसम्बन्ध स्थापित करते हुए राष्ट्रीय- सांस्कृतिक धारा का स्वरूप विवेचन भारतीय संस्कृति के विशिष्ट परिप्रेक्ष्य में किया है तथा उसकी अभिव्यक्ति भारतेन्दु तथा वीरेशलिंगम् कालीन साहित्य की विविध विधाओं साहित्य आदि में किस प्रकार हुई है, उसका विशद वर्णन किया है ।

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योग शिक्षा पाठ्यक्रम

बालकों के सर्वांगीण विकास के लिए विद्या भारती ने जो पांच अनिवार्य विषय निर्धारित किये हैं उसमें योग शिक्षा का बहुत महत्व है। योग एक ऐसा विज्ञान है जो शरीर को सशक्त बनाता है। बुद्धि को प्रखरता प्रदान करता है और बालकों के चारित्रिक विकास में योगदान करता है। आज सारा तनावग्रस्त तथा मनोरोगों में फंसा पाश्चात्य जगत योग की मांग कर रहा है। योग का शिक्षण व्यवस्थित रूप से मिल सके, उसके लिए प्राथमिक से लेकर माध्यमिक कक्षाओं, प्रशिक्षण विद्यालयों और आचार्य शिक्षण वर्गों के लिये यह योग शिक्षा का पाठ्यक्रम निर्माण किया गया है।

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लालयेत पंचवर्षाणि, शिशु शिक्षा: दिशा एवं स्वरूप

शिशु शिक्षा के क्षेत्र में ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जो बचपन से ही बालक के जीवन में उच्च आदर्शों का समावेश करा सके तथा उनका बौद्धिक विकास भी कर सके। बालक जन्म से लेकर पांच वर्ष तक मां की, दादा-दादी की गोद में किलकारियां भरता हुआ सामाजिक परम्पराओं, मान्यताओं को उतार लेता है। भारतीय परम्पराओं के अनुसार बालक को गर्भ अवस्था से लेकर पांच वर्ष तक की शिक्षा पर विचार एक समग्रता से करने की आवश्यकता है। इस दृष्टि से इस पुस्तक का बालक के पालन पोषण और उसको सही मानव बनाने में बड़ा लाभदायक सिद्ध होगा।

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विद्या भारती दिशा बोध

विद्या भारती अखिल भारती शिक्षा संस्थान आज विश्व का सबसे बड़ा गैर सरकारी संगठन बनकर विश्व पटल पर उभरा है, जिसके द्वारा लगभग 20 लाख बच्चे सारे भारत वर्ष में शिक्षा के साथ-साथ देश भक्ति और समाज सेवा के संस्कार प्राप्त कर रहे हैं। इतने बड़े कार्य को चलाने के लिए सैकड़ों बन्धुओं ने अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया है। ऐसे ही पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं का एक अभ्यास वर्ग 1996 में आयोजित किया गया था, उसके विचाराधीन सभी विषयों पर जो गहन चिंतन किया गया, उसको इस पुस्तक में समाविष्ट कर दिया है। इसलिए सभी कार्यकर्ताओं के लिए यह पुस्तक एक स्थायी निधि सिद्ध होगी।

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विद्यालय में संस्कारक्षम वातावरण

सभ्यता एवं संस्कृति की परम्पराओं को सुरक्षित रखने तथा सांस्कृतिक विकास का एकमात्र साधन शिक्षा है। एक महान शिक्षाविद् ने कहा है कि आप मुझे अपने कक्षा कक्षों में ले चलो तो मैं आपके देश का भाग्य लिख दूंगा कि इस समाज का भविष्य उज्ज्वल है या यह नष्ट हो जाएगा। जैसा समाज हम निर्माण करना चाहते हैं, वैसे ही संस्कार हमें अपने विद्यालयों के माध्यम से देना आवश्यक है। इस दिशा में विद्या भारती ने इस पुस्तक में सारी रूपरेखा प्रस्तुत की है कि हमारे विद्यालयों में संस्कारक्षम वातावरण कैसे निर्माण हो।

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