नभ योद्‌ध्यांनी जिंकियले

A retired Navy Officer has made a sincere attempt to motivate the youths from Maharashtra towards joining the Army

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नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा, पाठ्यक्रम की रूपरेखा

बच्चों का नैतिक एवं चारित्रिक विकास करने के लिए विद्या भारती ने अपने पांच आधारभूत विषयों में नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा को महत्वपूर्ण स्थान दिया है। शिक्षा यदि आत्मिक उत्थान में सहायक नहीं होती तो वह सही शिक्षा कहलाने योग्य नहीं है। आज जितनी तीव्र गति से नैतिक क्षरण तथा आदर्शहीनता बढ़ती जा रही है वह समाज जीवन को विकृत बना रही है। विद्या भारती ने इस चुनौती को स्वीकार किया है। इस दृष्टि से विद्या भारती ने शिशु कक्षा से द्वादश तक यह नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा का पाठ्यक्रम तैयार किया है।

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नैतिक शिक्षा

राष्ट्र को वर्तमान नैतिक पतन की अवस्था से निकालने का एक ही मार्ग है कि शिक्षा को जीवनादर्शों से युक्त किया जाये। इस पुस्तक में भारत के अनेक प्रमुख शिक्षाविदों के नैतिक शिक्षा सम्बन्धी बहुमूल्य विचार दिए हैं, तथा नैतिक शिक्षा के स्वरूप तथा शिक्षण विधियों की विशद चर्चा की गई है। इस पुस्तक का सम्पादन मा॰ श्री लज्जाराम तोमर जी ने किया है।

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पंचकोशात्मक विकास के पथ पर

शिक्षा का विचार नित्य नूतन – चिर – पुरातन है । जितनी आवश्यकता प्राचीन ज्ञान के तर्कसंगत भाग को अंगीकार कर उनके प्रति श्रद्धा बनाए रखने की है , उतनी ही नई बातों को स्वीकार करने की भी है। ‘ व्यक्तित्व के सर्वाङ्गीण विकास ‘ की भारतीय अवधारणा इसी प्रकार का शाश्वत विचार है । यह आज के प्रचलित Personality Development से भिन्न है। डॉ . मधुश्री सावजी ने अत्यन्त परिश्रमपूर्वक भारतीय विचार पर आधारित पंचकोशात्मक विकास की इस संकल्पना पर इस पुस्तिका की रचना मूलत : मराठी में की है यह उसका हिंदी अनुवाद है।

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परिवारों में संस्कारक्षम वातावरण क्यों और कैसे

बालक के विकास में परिवार के वातावरण का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान होता है। परिवार में बड़ों का व्यवहार बालक के जीवन को बहुत प्रभावित करता है। बालक को अच्छा नागरिक बनाने के लिए घरों में शिष्टाचार, बोलने चालने का ढंग, बांटकर वस्तुओं का सेवन करना, परस्पर प्रेम, सहानुभूति, भोजन व्यवस्था आदि सिखाने में परिशुद्ध वातावरण की आवश्यकता है, जिसका स्वरूप इस पुस्तक में वर्णित है। परिवार ही समाज को आधारभूत इकाई होने के कारण स्वस्थ समाज का निर्माण करने वाली इकाई है।

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पालकाय नमः

यह पहली पुस्तक है जिसके अपेक्षित पाठक वर्ग में ( Target Reader ) अभिभावक, पालक, माता – पिता हैं। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जहाँ अधिकांश परिवारों में माता-पिता दोनों जीविका उपार्जन की दृष्टि से कार्यरत हों, परिवार के सदस्यों के बीच संवाद के लिए मिलने वाला समय और अवसर कम हो गए हों, जीवन से अपेक्षाएँ बढ़ी हों, बच्चों पर पाठ्यक्रम- गृहकार्य- कोचिंग- परीक्षा का अत्यधिक बोझ हो और जीवन में चुनौतियाँ बढ़ती जा रही हों, पालकाय नमः में संजोए गए विचार-सूत्र अभिभावकों के लिए उपयोगी होंगे ।

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प्रतिज्ञा

प्रतिज्ञा

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