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१८५७ का महासमर

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संपादक : राजेन्द्र कुशवाह संपादक : राजेन्द्र कुशवाह भारत के इतिहास का पुनर्लेखन भू-सांस्कृतिक क्षेत्र (जीओ-कल्चरल रिजन) के आधार पर होना चाहिए| प्रशासनिक जिले तो बदलते रहते है| इस को ध्यान में रखते हुए अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के नवम्बर २००९ को कुरुक्षेत्र में आयोजित राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान अखिल भारतीय सेमीनार के ल्यिे दो विषय रखे गये| १. भारत की सांस्कृतिक जीवनधारा- सरस्वती तथा २. १८५७ के स्वातंत्र्य समर में अपने-अपने प्रान्त का योगदान| इस ग्रन्थ में ‘१८५७ के स्वातंत्र्य समर में अपने-अपने प्रान्त का योगदान’ विषय पर प्रस्तुत शोध-पत्रों का संकलन किया गया है|  
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संपादक : राजेन्द्र कुशवाह

भारत के इतिहास का पुनर्लेखन भू-सांस्कृतिक क्षेत्र (जीओ-कल्चरल रिजन) के आधार पर होना चाहिए| प्रशासनिक जिले तो बदलते रहते है| इस को ध्यान में रखते हुए अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के नवम्बर २००९ को कुरुक्षेत्र में आयोजित राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान अखिल भारतीय सेमीनार के ल्यिे दो विषय रखे गये| १. भारत की सांस्कृतिक जीवनधारा- सरस्वती तथा २. १८५७ के स्वातंत्र्य समर में अपने-अपने प्रान्त का योगदान|

इस ग्रन्थ में ‘१८५७ के स्वातंत्र्य समर में अपने-अपने प्रान्त का योगदान’ विषय पर प्रस्तुत शोध-पत्रों का संकलन किया गया है|

 

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